Dr. Har Gobind Khorana

डॉ हरगोविन्द खुराना (Dr. Har Gobind Khorana) का जन्म पंजाब में मुल्‍तान जिले के  छोटे से गांव रायपुर में हुआ था, जो कि अब पाकिस्तान में है। […]
डॉ हरगोविन्द खुराना (Dr. Har Gobind Khorana) का जन्म पंजाब में मुल्‍तान जिले के  छोटे से गांव रायपुर में हुआ था, जो कि अब पाकिस्तान में है। इनके गाँव में १०० परिवार रहते थे जिनमे केवल इनका परिवार ही शिक्षित था। इनकी सही जन्म तिथि की जानकारी किसी को नहीं है, प्रमाण पत्रो में ९ जनवरी १९२२ दर्ज है।  वह अपने  पांच भाई बहनो में सबसे छोटे थे। वे प्रारम्‍भ से मेधावी विद्यार्थी थे। इनको बचपन से ही गणित में विशेष रूचि थी  वे माँ के खाना बनाते समय उनके पास बैठकर पढ़ाई करते और शर्त लगाते हुए कहते- माँ, देखता हूँ मेरा सवाल पहले हल होता है, या तुम्‍हारी रोटी पहले उतरती है। और इस शर्त में अक्‍सर वे ही सफल होते।  डॉ खुराना की स्कूली शिक्षा डी ए वी स्कूल, मुल्तान में हुयी, वहाँ के शिक्षक रतन लाल से ये बहुत ही प्रभावित थे। स्नातक विज्ञानं बिषय से (१९४३ , ऑनर्स के साथ) व् परास्नातक  रसायन विज्ञान में (१९४५, ऑनर्स  के साथ) पंजाब यूनिवर्सिटी, लाहौर से उत्तीर्ण किया। हरगोविंद ने लिवरपूल विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ पर उन्‍हें नोबेल पुरस्‍कार विजेता प्रो. अलेक्‍जेंडर टॉड के साथ, जैव रसायन के अन्‍तर्गत ‘न्‍यूक्लिओटाइड’ विषय में शोधकार्य किया। सन 1948 में उनका शोधकार्य पूरा हुआ। तत्पश्चात प्रोफेसर व्लदीमिर प्रेलॉग के निर्देशन में पोस्ट डॉक्ट्रेट फेलोशिप (१९४८-१९४९) के लिए फेडरल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, ज़ुरिच स्विटजरलैंड चले गए।  यहाँ इनका साइंस फिलोसोफी के प्रति रुझान उत्पन्न हुआ।
डॉ खुराना अपनी पढाई पूरी करके अपने भाई के पास आ गये। उन्‍होंने दिल्‍ली बंगलौर सहित कई प्रयोगशालाओं में नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन संयोग से उनको मनचाही नौकरी नहीं मिली और वह वापस इंग्‍लैण्‍ड चले गये।  जहाँ डॉ खुराना को प्रोफेसर जी डव्ल्यू केन्नेर और प्रोफेसर ए  आर टॉड के साथ कार्य करने का मौका मिला।
1952 में उनके पास कोलम्बिया विश्‍विद्यालय से बुलावा आया। वे वहाँ चले गये और जैव रसायन विभाग के अध्‍यक्ष नियुक्त हुए  वहाँ पर रहकर उन्‍होंने आनुवाँशिकी में शोध किया। सन 1960 में डॉ. खुराना अमेरिका चले गये। वहाँ पर वे विस्‍काँसिन विश्‍वविद्यालय के एंजाइम शोध संस्‍थान के सहायक निर्देशक चुने गए, तथा बाद में वे संस्‍थान के महानिदेशक भी बने। डॉ. खुराना ने सन 1966 में अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली।
खुराना जी जीवकोशिकाओं के नाभिकों की रासायनिक संरचना के अध्ययन में लगे रहे।  इनके अध्ययन का विषय न्यूक्लिऔटिड नामक उपसमुच्चर्यों की अत्यंत जटिल, मूल, रासायनिक संरचनाएँ था,  डॉ खुराना इन समुच्चयों का योग कर महत्व के दो वर्गों के न्यूक्लिप्रोटिड इन्जाइम नामक यौगिकों को बनाने में सफल हुये।
नाभिकीय अम्ल सहस्रों एकल न्यूक्लिऔटिडों से बनते हैं। जैव कोशिकओं के आनुवंशिकीय गुण इन्हीं जटिल बहु न्यूक्लिऔटिडों की संरचना पर निर्भर रहते हैं। डॉ॰ खुराना ग्यारह न्यूक्लिऔटिडों का योग करने में सफल हो गए थे तथा वे विश्व के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने, ज्ञात शृंखलाबद्ध न्यूक्लिऔटिडोंवाले न्यूक्लीक अम्ल का प्रयोगशाला में संश्लेषण करने में सफलता प्राप्त की। इस सफलता से ऐमिनो अम्लों की संरचना तथा आनुवंशिकीय गुणों का संबंध समझना संभव हो गया है और वैज्ञानिक अब आनुवंशिकीय रोगों का कारण और उनको दूर करने का उपाय ढूँढने में सफल हो सकेंगे।
उनका यह शोध बहुत महत्‍वपूर्ण सिद्ध हुआ, जिसपर उन्‍हें वर्ष 1968 का चिकित्‍सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार अमेरिकी वैज्ञानिक मार्शल निरेनबर्ग  और डॉ. रॉबर्ट डब्‍लू. रैले के साथ दिया गया , उन्‍हें लोइसा ग्रॉस हॉर्विट्ज़ प्राइज कोलम्बिया यूनिवर्सिटी ने १९६८ में दिया इसके अतिरिक्‍त विलार्ड गिब्स अवार्ड , गैर्डनेर फाउंडेशन इंटरनटीनल अवार्ड, एल्वर्ट लास्कर अवार्ड फॉर बेसिक मेडिसिन रिसर्च, कनाडा का मर्क मैडल, कनाडियन पब्लिक सर्विस का स्‍वर्ण पदक, डैनी हैनमैन पुरस्‍कार, तथा लॉस्‍कर फेडरेशन पुरस्‍कार प्राप्‍त हुए। सन 1969 में जब डॉ. खुराना भारत आए, उस समय भारत सरकार ने उन्‍हें पद्म भूषण से अलंकृत किया। भारत के महान वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना 09 नवम्‍बर, 2011 को स्वर्गवास हो गया।  वे चिकित्सा विज्ञानं में अपने अभूतपूर्व शोध कार्य के लिए सदैव याद किये जायेंगे।

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